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Indian Railways: आखिर क्यों कहा जाता है 'फ्लाइंग रानी एक्सप्रेस'? जानें इसके फैक्ट्स और इतिहास

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Indian Railways: आखिर क्यों कहा जाता है 'फ्लाइंग रानी एक्सप्रेस'? जानें इसके फैक्ट्स और इतिहास

Indian Railways: भारतीय रेलवे ने देश की पहली डबल-डेकर कोच ट्रेन, "फ्लाइंग रानी" को नए लिंके हॉफमैन बुश (एलएचबी) रेक से बदल दिया है. इस नये रेल सेवा में पारंपरिक रेक की तुलना में आराम, सुविधा और सुरक्षा के मामले में कई सुधार हुए हैं. फ्लाइंग रानी नाम के पीछे एक रोचक कहानी भी है. यह ट्रेन पश्चिमी रेलवे की रानी के नाम से भी प्रसिद्ध हुई. यह उच्चतम मान्यता प्राप्त ट्रेन अब मुंबई से सूरत के बीच लोगों की जरूरतों को पूरा करने का काम कर रही है. इसके शुरू होने से पहले, बॉम्बे सेंट्रल स्टेशन में बुलसर (जिसे अब वलसाड कहते हैं) के तत्कालीन जिला अधिक्षक की पत्नी ने इस ट्रेन का नाम "फ्लाइंग रानी" रखा था.

'फ्लाइंग रानी' पहली बार कब आई थी?
फ्लाइंग रानी एक्सप्रेस ने पहली बार 1906 में अपनी सेवा शुरू की थी. हालांकि, बीच-बीच में इसे बंद कर दिया गया और 1950 से यह फिर से पटरी पर आ गई. देश की आजादी के बाद, बीबी एंड सीआई रेलवे के तत्कालीन महाप्रबंधक (जीएम) केपी मुशरान ने जुलाई 1950 में जनता को आश्वासन दिया कि ट्रेन वापस सेवा में आ जाएगी. फ्लाइंग रानी एक्सप्रेस ने 01 नवंबर, 1950 को सूरत रेलवे स्टेशन से आठ कोचों के साथ लगभग 600 यात्रियों को लेकर अपनी पहली यात्रा शुरू की थी. इसमें शाकाहारियों और मांसाहारियों के लिए डाइनिंग कार के साथ द्वितीय और तृतीय श्रेणी की सुविधा थी.

पहले यह ट्रेन कहां-कहां पर रुकती थी?
यह पहली बार है कि नेशनल ट्रांसपोर्टर ने थर्ड क्लास के यात्रियों के लिए रिजर्वेशन फेसिलिटी शुरू की. 1950 के दशक में, 1930 के दशक की तरह, फ्लाइंग रानी एक्सप्रेस ट्रेन रविवार को छोड़कर सप्ताह के सभी दिनों में चलती थी. सीमित स्टॉपेज प्वाइंट के साथ दोनों शहरों के बीच यह सबसे तेज ट्रेन थी. यात्रा के दौरान ट्रेन बोरीवली, पालघर, दहानू, दमन, उदवाड़ा, वलसाड, बिलिमोरा और नवसारी में रुकी. बाद के सालों में, रेलवे ने अपने स्टॉपेज को संशोधित किया और यात्रियों के लिए सभी महत्वपूर्ण समुद्र तटीय रिसॉर्ट्स जैसे - घोलवड, उम्बरगांव रोड और संजान पर स्टॉप बनाए.

रानी एक्सप्रेस में हुए कई बदलाव
फ्लाइंग रानी एक्सप्रेस ने 1965 में एक और मील का पत्थर हासिल किया. यह देश में सबसे तेज मध्यम दूरी की ट्रेन बन गई. ट्रेन का रंग भी बदल दिया गया और उसे जोनल रेलवे के नीले रंग का एक अलग हल्का और गहरा कोट दिया गया. हालांकि, 1976 में ट्रेन को फिर से पेंट किया गया और इसे हल्के और गहरे हरे रंग का शेड दिया गया. इसने जून 1977 से इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन पर अपना परिचालन शुरू किया. फ्लाइंग रानी एक्सप्रेस 18 दिसंबर, 1979 को डबल-डेकर कोचों से जुड़ी पहली ट्रेन बन गई. ट्रेन में दस द्वितीय श्रेणी डबल-डेकर कोच थे, जिनमें से प्रत्येक कोच की क्षमता 148 यात्रियों की थी.


फ्लाइंग रानी एक्सप्रेस की अब क्या है टाइमिंग
वर्तमान में, एक सदी पुरानी ट्रेन प्रतिदिन सुबह 5:10 बजे सूरत से रवाना होती है और 09:50 बजे मुंबई पहुंचती है. अपनी वापसी यात्रा में, ट्रेन मुंबई सेंट्रल से 17:55 बजे प्रस्थान करती है और 22:35 बजे गंतव्य पर पहुंचती है.