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हरियाणा के 4 बड़े नेताओं के लिए खतरे की घंटी, पूर्व CM चौटाला और अजय चौटाला भी शामिल; हाईकोर्ट ने पूछा- क्यों न रोक दें, जानें क्या है पूरा मामला

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हरियाणा के 4 बड़े नेताओं के लिए खतरे की घंटी, पूर्व CM चौटाला और अजय चौटाला भी शामिल; हाईकोर्ट ने पूछा- क्यों न रोक दें, जानें क्या है पूरा मामला
हरियाणा के 4 बड़े नेताओं की पेंशन पर खतरा मंडरा रहा है। इन नेताओं की सूची में पूर्व CM ओम प्रकाश चौटाला का नाम भी शामिल हैं। इन नेताओं पर आरोप है कि वह आपराधिक मामलों में सजा होने के बाद भी पूर्व विधायक होने की पेंशन ले रहे हैं।

हालांकि अभी मामला पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में चल रहा है। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने नेताओं से पूछा है कि क्यों न उनकी पेंशन रोक दी जाए?। इस मामले की अगली सुनवाई मार्च महीने में होगी।

ओपी चौटाला समेत इन नेताओं को सजा हो चुकी
16 दिसंबर 2013 को कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पूर्व CM ओपी चौटाला, उनके बेटे अजय चौटाला और पूर्व विधायक शेर सिंह बड़शामी को भ्रष्टाचार के केस में 10 साल की सजा चुनाई जा चुकी है। इसके अलावा पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सतबीर सिंह कादियान को भी 26 अगस्त 2016 को सात साल कैद की सजा सुनाई जा चुकी है। सतबीर कादियान का निधन हो चुका है। अब उनके परिवार को पेंशन मिल रही है। सजा होने के बाद विधायक को पेंशन का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे में यह गैरकानूनी है।


किस नेता को कितनी पेंशन मिल रही
पूर्व CM ओपी चौटाला को अभी 2 लाख 15 हजार 430 रुपए महीना पेंशन मिल रही है। जबकि उनके बेटे अजय चौटाला को 50 हजार रुपए प्रति माह के हिसाब से पेंशन मिल रही है। पूर्व विधायक सतबीर सिंह कादियान और शेर सिंह बड़माशी भी हरियाणा सरकार से 50 हजार 10 रुपये पेंशन ले रहे हैं।

288 पूर्व विधायक ले रहे हैं पेंशन
हरियाणा सचिवालय में याची एचसी अरोड़ा ने पूर्व विधायकों की पेंशन को लेकर एक याचिका लगाई थी, जिसमें जानकारी दी गई थी कि अभी वर्तमान में 288 पूर्व विधायक ऐसे हैं जो पेंशन ले रहे हैं। इनमें चार पूर्व विधायक वह हैं जिन्हें अलग अलग मामलों में सजा सुनाई जा चुकी है।


वकील ने यह दी दलील
याचिका दायर करने वाले एडवोकेट एचसी अरोड़ा ने कहा कि हरियाणा विधानसभा की धारा 7-ए (1-ए) (वेतन, भत्ता और सदस्यों की पेंशन) अधिनियम, 1975 के तहत स्पष्ट लिखा हुआ है कि अगर किसी विधायक को कोर्ट सजा सुना देती है तो वह पेंशन के अयोग्य हो जाता है। पहले उन्होंने विधानसभा सचिव के आगे पेंशन रोकने की एप्लीकेशन दी थी।

विधानसभा सचिव ने इसे वेतन-भत्ते एवं पेंशन एक्ट के तहत जायज करार दिया। सचिव ने फैसले में कहा कि उनकी सदस्यता न तो कभी दलबदल कानून के तहत रद हुई और न इन्हें जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत अयोग्य ठहराया गया। इस वजह से उन्हें हाईकोर्ट आना पड़ा।